Monday, December 17, 2012
KUCHH KVITAYEN ATAL BIHARI BAJPEYE JEE KI
* ठन गई!
मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,
रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।
मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।
मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?
तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।
मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।
बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।
प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।
हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।
आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।
पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।
मौत से ठन गई।
* बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
SHABAD KALAM KE
अंग्रेजी आवश्यक है क्योंकि वर्तमान में विज्ञान के मूल काम अंग्रेजी
में हैं. मेरा विश्वास है कि अगले दो दशक में विज्ञान के मूल काम हमारी
भाषाओँ में आने शुरू हो जायेंगे, तब हम जापानियों की तरह आगे बढ़ सकेंगे.
अब्दुल कलाम
मुझे बताइए , यहाँ का मीडिया इतना नकारात्मक क्यों है? भारत में हम अपनी अच्छाइयों, अपनी उपलब्धियों को दर्शाने में इतना शर्मिंदा क्यों होते हैं? हम एक माहान राष्ट्र हैं. हमारे पास ढेरों सफलता की गाथाएँ हैं, लेकिन हम उन्हें नहीं स्वीकारते. क्यों?
अब्दुल कलाम
EK BODH KATHA
एक बोध कथा
जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी - जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा ,"काँच की बरनी और दो कप चाय"हमें याद आती है ।
दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ...
उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की
जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी - जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा ,"काँच की बरनी और दो कप चाय"हमें याद आती है ।
दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ...
उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की
बडी़ बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे
और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची ...
उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ ... आवाज आई ...
फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे - छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये h धीरे -
धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये ,
फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक
बार फ़िर हाँ ... कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस
बरनी में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई ,
अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब
तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ .. अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर
में कहा .. सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार
में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई ...
प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया –
इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो ....
टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं ,
छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और
रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है ..
अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी ...
ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ... यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा ... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ , घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक - अप करवाओ ... टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है ..... पहले तय करो कि क्या जरूरी है ... बाकी सब तो रेत है ..
छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे .. अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि"चाय के दो कप"क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया ...
इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन हमारे पास उस परम पिता परमात्मा को सिमरन करने के लिए हमेशा समय होना चाहिए I
प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया –
इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो ....
टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं ,
छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और
रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है ..
अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी ...
ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ... यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा ... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ , घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक - अप करवाओ ... टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है ..... पहले तय करो कि क्या जरूरी है ... बाकी सब तो रेत है ..
छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे .. अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि"चाय के दो कप"क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया ...
इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन हमारे पास उस परम पिता परमात्मा को सिमरन करने के लिए हमेशा समय होना चाहिए I
MAA VS GOD
एक बेटा पढ़-लिख कर बहुत बड़ा आदमी बन
गया । पिता के स्वर्गवास के बाद माँ ने हर
तरह का काम करके उसे इस काबिल
बना दिया था । शादी के बाद
पत्नी को माँ से शिकायत रहने लगी के
वो उन के स्टेटस मे फिट नहीं है ।
लोगों को बताने मे उन्हें संकोच होता की ये
अनपढ़ उनकी माँ-सास है । बात बढ़ने पर बेटे
ने एक दिन माँ से कहा-
" माँ_मै चाहता हूँ कि मै अब इस काबिल
गया । पिता के स्वर्गवास के बाद माँ ने हर
तरह का काम करके उसे इस काबिल
बना दिया था । शादी के बाद
पत्नी को माँ से शिकायत रहने लगी के
वो उन के स्टेटस मे फिट नहीं है ।
लोगों को बताने मे उन्हें संकोच होता की ये
अनपढ़ उनकी माँ-सास है । बात बढ़ने पर बेटे
ने एक दिन माँ से कहा-
" माँ_मै चाहता हूँ कि मै अब इस काबिल
हो गया हूँ कि कोई भी क़र्ज़ अदा कर
सकता
हूँ । मै और तुम दोनों सुखी रहें इसलिए आज
तुम मुझ पर किये गए अब तक के सारे खर्च सूद
और व्याज के साथ मिला कर बता दो । मै
वो अदा कर दूंगा । फिर हम अलग-अलग
सुखी रहेंगे ।
माँ ने सोच कर उत्तर दिया -
"बेटा_हिसाब ज़रा लम्बा है ,सोच कर
बताना पडेगा।मुझे थोडा वक्त चाहिए ।"
बेटे ना कहा - " माँ _कोई ज़ल्दी नहीं है ।
दो-चार दिनों मे बात देना ।"
रात हुई, सब सो गए । माँ ने एक लोटे मे
पानी लिया और बेटे के कमरे मे आई ।
बेटा जहाँ सो रहा था उसके एक ओर
पानी डाल दिया । बेटे ने करवट ले ली ।
माँ ने दूसरी ओर भी पानी डाल दिया। बेटे
ने जिस ओर भी करवट ली_माँ उसी ओर
पानी डालती रही तब परेशान होकर
बेटा उठ कर खीज कर बोला कि माँ ये
क्या है ? मेरे पूरे बिस्तर को पानी-
पानी क्यूँ कर डाला...?
माँ बोली-
" बेटा, तुने मुझसे पूरी ज़िन्दगी का हिसाब
बनानें को कहा था । मै अभी ये हिसाब
लगा रही थी कि मैंने कितनी रातें तेरे
बचपन मे तेरे बिस्तर गीला कर देने से जागते
हुए काटीं हैं । ये तो पहली रात है ओर तू
अभी से घबरा गया ...? मैंने अभी हिसाब
तो शुरू भी नहीं किया है जिसे तू अदा कर
पाए।"
माँ कि इस बात ने बेटे के ह्रदय को झगझोड़
के रख दिया । फिर वो रात उसने सोचने मे
ही गुज़ार दी । उसे ये अहसास
हो गया था कि माँ का क़र्ज़ आजीवन
नहीं उतरा जा सकता । माँ अगर शीतल
छाया है पिता बरगद है जिसके नीचे
बेटा उन्मुक्त भाव से जीवन बिताता है ।
माता अगर अपनी संतान के लिए हर दुःख
उठाने को तैयार रहती है तो पिता सारे
जीवन उन्हें पीता ही रहता है ।
माँ बाप का क़र्ज़
कभी अदा नहीं किया जा सकता । हम
तो बस उनके किये गए कार्यों को आगे
बढ़ा कर अपने हित मे काम कर रहे हैं ।
आखिर हमें भी तो अपने बच्चों से
वही चाहिए ना ...?
सकता
हूँ । मै और तुम दोनों सुखी रहें इसलिए आज
तुम मुझ पर किये गए अब तक के सारे खर्च सूद
और व्याज के साथ मिला कर बता दो । मै
वो अदा कर दूंगा । फिर हम अलग-अलग
सुखी रहेंगे ।
माँ ने सोच कर उत्तर दिया -
"बेटा_हिसाब ज़रा लम्बा है ,सोच कर
बताना पडेगा।मुझे थोडा वक्त चाहिए ।"
बेटे ना कहा - " माँ _कोई ज़ल्दी नहीं है ।
दो-चार दिनों मे बात देना ।"
रात हुई, सब सो गए । माँ ने एक लोटे मे
पानी लिया और बेटे के कमरे मे आई ।
बेटा जहाँ सो रहा था उसके एक ओर
पानी डाल दिया । बेटे ने करवट ले ली ।
माँ ने दूसरी ओर भी पानी डाल दिया। बेटे
ने जिस ओर भी करवट ली_माँ उसी ओर
पानी डालती रही तब परेशान होकर
बेटा उठ कर खीज कर बोला कि माँ ये
क्या है ? मेरे पूरे बिस्तर को पानी-
पानी क्यूँ कर डाला...?
माँ बोली-
" बेटा, तुने मुझसे पूरी ज़िन्दगी का हिसाब
बनानें को कहा था । मै अभी ये हिसाब
लगा रही थी कि मैंने कितनी रातें तेरे
बचपन मे तेरे बिस्तर गीला कर देने से जागते
हुए काटीं हैं । ये तो पहली रात है ओर तू
अभी से घबरा गया ...? मैंने अभी हिसाब
तो शुरू भी नहीं किया है जिसे तू अदा कर
पाए।"
माँ कि इस बात ने बेटे के ह्रदय को झगझोड़
के रख दिया । फिर वो रात उसने सोचने मे
ही गुज़ार दी । उसे ये अहसास
हो गया था कि माँ का क़र्ज़ आजीवन
नहीं उतरा जा सकता । माँ अगर शीतल
छाया है पिता बरगद है जिसके नीचे
बेटा उन्मुक्त भाव से जीवन बिताता है ।
माता अगर अपनी संतान के लिए हर दुःख
उठाने को तैयार रहती है तो पिता सारे
जीवन उन्हें पीता ही रहता है ।
माँ बाप का क़र्ज़
कभी अदा नहीं किया जा सकता । हम
तो बस उनके किये गए कार्यों को आगे
बढ़ा कर अपने हित मे काम कर रहे हैं ।
आखिर हमें भी तो अपने बच्चों से
वही चाहिए ना ...?
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